मेरी आप बीती कहानी मेरी जुबानी
महाकवि गिरोह का सरदार
एक कवि मित्र मेरे पास आये,
बड़े अदब से फरमाये।
मुझे पता चला आप निराश हो,
आजकल बहुत ही उदास हो।
क्योकि कोई तुम्हे अपने गिरोह में न मिलाता है,
कभी भी किसी कवि सम्मेलन में न बुलाता है।
मैंने आगे से कहा हाँ अंतर्यामी ज्ञानी ध्यानी,
वास्तव में मुझे यही है विकट परेशानी।
यही तो है मुझे भयंकर पीड़ा,
शांत नही होता मेरे मन का कीड़ा।
ये तो सत्य है जब तक कवि किसी को कविता न सुनाता है,
उसे जरा चैन न आता है यदि दो चार लोग कविता सुन ले,
तो कवि का चार किलो खून बढ़ जाता है।
आगे से कवि मित्र बोला अरे नादान,
क्या तू इसलिए है परेशान,
इस परेशानी का मेरे पास समाधान,
इस मुश्किल को हल करेगा आसान,
कवि गिरोह का सरदार महाकवि घमासान,
बस तुम्हे देना पड़ेगा थोड़ा सा दान।
इसमें क्या है जो गुरू दीक्षा देते है ,
वो सारे ही दान लेते। है
इसमें काये का अपमान,
दान देना तो कार्य महान।
कवि मित्र की बातें सुन मुझे हुआ आत्म ज्ञान,
महाकवि सरदार से मिलने को मैंने किया प्रस्थान।
मैं महाकवि घमासान के पास आया,
घमासान ने हमें देखकर पूरा घमासान मचाया।
हमें देख कर पहले वो मुस्कराया,
फिर उसने जोर से ठहका लगाया,
तत्पश्चात प्यार से फ़रमाया,
सुना है बरखुरदार तू कवियों का है सताया,
आजतक तुझे किसी ने हाथ नही पकड़ाया।
लेकिन ये महाकवि कवि गिरोह का सरदार तुम्हे नया जलवा दिखायेगा,
तुझे किसी ने हाथ नही पकड़ाया मगर महाकवि तुझे पूरी बाजू पकड़ायेगा।
मगर पहले तू कोई अपनी कविता सुना,
सरदार का मन बहला।
मैंने झट तड़कती फड़कती कविता सुनाई,
सरदार के मन भायी फिर सरदार ने दरिया दिली दिखाई।
मुझे सीने से लगा लिया,
और सौ का नोट थमा दिया।
मैं फूल कर हो गया कुप्पा,
मुझे न खबर थी बकरे को हलाल करने की तैयारी कर रहा है फुफ्फा।
मैंने कविता सुना सुना कर मन के सारे गुबार निकाल दिये,
महाकवि के सामने हथियार डाल दिये।
महाकवि घमासान ने फिर मेरा हौसला बढ़ाया,
पास बैठा कर बड़े प्रेम से समझाया।
हम महाकवि बोला हम तुम्हे बहुत बड़ा कवि बनायेगे,
कवि ही नही बनायेगे साथ में मोटी कमाई भी करवायेगे।
मैं मन में सोचने लगा कवि और कमाई,
इन दोनों का मेल कभी नही होता भाई।
फिर मैंने सोचा ये महाकवि है कुछ चक्कर चलाता ही होगा,
अपने साथ लगने वाले कवियों की कमाई करवाता ही होगा।
मुझ से मुखातिव हो कर महाकवि बोला?/
तुम्हे बस इतना करके दिखाना है,
एक उच्चकोटि का कवि सम्मेलन करवाना है।
इस कवि सम्मेलन में हम दस कवियों को बुलायेंगे,
उनके हाथ में पांच पांच थमायेगे वो मेरे चेले है मान जायेगे।
हमने आप से कुछ नही लेना,
हम आप के गुरू है इक पगड़ी और 11 हजार दे देना।
ध्यान करो इस कवि सम्मेलन में आप मात्र 61 हजार लगायेगे,
इस के बदले कई लाख कमायेगे।
लाख की बात सुन मेरी लार टपकने लगी,
आँखे चमकने लगी।
मैं सोचने लगा ऐसे ही मैं साल में चार पांच कवि सम्मेलन करवाऊगा,
मजे में पांच सात लाख रूपये कमाऊगा।
लोग कहते है कवि भूखे मरते है,
कुछ ही वर्षों मैं तो करोड़ पति बन जाऊगा।
ऐसा करके कवि को निखटू कहने वालो के मुँहू पर ताला लगाउँगा।
ये सोच कर मन खुश हुआ हवा का ठंडा झोंका आया हम सो गये,
महाकवि ने हमारे कंधे पे हाथ मारा और पूछा जनाब कहाँ खो गये।
मैंने कहा नही जी हमने कहाँ खोना है,
हम तो सोच रहे थे कवि सम्मेलन कैसे होना है।
महाकवि बोले आप चिंता न करो के यहां चार दिन पहले ही डेरा लगा लेंगे,
तुम पैसों का इंतजाम करवा लेना कवि सम्मेलन तो हम खुद ही करवा लेंगे।
मैं सोचने लगा अरे भाई,
लक्ष्मी खुद चल के घर है आई।
मैंने फिर जरा देर न लगाई,
महाकवि के सामने हाँ में गर्दन हिलाई।
मैं ख़ुशी ख़ुशी लौट के घर आया,
अपनी पत्नी को सारा विर्तांत सुनाया।
सुन बीवी दहाड़ी चिल्लाई,
बोली तूने खुद को लुटवाने की नै योजना है बनाई।
मैं कहा नही मुझे अब समझ है आई,
रैना पहली बार करेगा मोटी कमाई।
मेरी बातें सुन मेरी बीवी हारी,
मैंने कवि सम्मेलन की कर ली तैयारी।
महा कवि ने जरा तरस न खाया,
पूरे एक लाख में टिकाया।
मैं फिर भी न घबराया,
मैंने सोचा चलो कमाने का साधन है बनाया।
अगले दिन मैंने महाकवि को फोन मिलाया,
वो आगे से बोला कौन बोल रहा है भाया।
मैं आगे से बोला मैं रैना हिंदुस्तानी,
वो आगे से बोला हम कौन से है पाकिस्तानी।
मैंने कहा गुरु देव आप ने कवि सम्मेलन के बारे बताना था,
वो बोले कैसे बताते तेरे जैसे नये चेले ने आना था,
उसने भी तेरी तरह कवि सम्मेलन करवाना था।
वही तुझे बुलवाना था।
मैं तैश में आ गया बोला क्या आप ऐसे ही चक्कर चलाते हो।
नये मुर्गों को फसाते हो।
महा कवि गुस्से में आ गया बोला तू अक्ल का अँधा,
तू कवि सम्मेलन को समझता है धंधा।
मैंने आगे से कहा जो आप ने मुझे कहा था वो क्या था फंडा।
महाकवि आगे से चिल्लाया मैं तेरा गुरु हूँ मुँहू को लगा ले ताला,
महा कवि का उपदेश सुन मैं चुप रह गया,
एक लाख का दर्द भी सह गया।
मगर मैं इतना समझा कुछ कवि ऐसा ही चक्कर चलते है,
उभरते कवियों को मुर्ख बनाते है उन्हें कविता से दूर हटाते है।
ऐसे कुछ कवि कविता की इज्जत का करते हनन,
उभरते कवियों का करते दमन।
ये कवि नही पखंडी है,
दुष्ट आत्मा शिखंडी है।
रैना"का बस इतना ही कहना,
ऐसे कवियों से बच के रहना।रैना"