देख जमाने की फितरत इतने हैरान न हो,
बेनूर हुई है फिजा इस कदर परेशान न हो,
वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता ही रहता है,
मौसम का क्या ये तो बदलता ही रहता है। रैना"
बेशक इंसान जीता ताउम्र नादानी में है,
लेकिन समझता कौन कितने पानी में है,
कविता आप ने कविता को महकाया है,
लोगों ने तभी तुम्हे पलकों पर बैठाया है। रैना"
बेनूर हुई है फिजा इस कदर परेशान न हो,
वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता ही रहता है,
मौसम का क्या ये तो बदलता ही रहता है। रैना"
बेशक इंसान जीता ताउम्र नादानी में है,
लेकिन समझता कौन कितने पानी में है,
कविता आप ने कविता को महकाया है,
लोगों ने तभी तुम्हे पलकों पर बैठाया है। रैना"
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