पत्रकारों की दुखत कहानी,पत्रकार की जुबानी,
दोस्तों आप से अनुरोध है
ज्यादा से ज्यादा इस पोस्ट को शेयर करे। युवाओं के भविष्य का सवाल है
दोस्तों मुझे ये बताने में हो रहा भयंकर कष्ट है,
अधिकतर भारत का मिडिया हो गया भरष्ट है।
अधिकतर अख़बार पत्रकार नही गुर्गे ढूंढते है,
फिर गुर्गे सारा दिन पैसे बोतल और मुर्गे ढूंढते है।
कुछ गुर्गे खुद को बड़ा खतरनाक पत्रकार बताते है,
ऐसे बेचारे बॉस की सीटें ही बुक करते नजर आते है।
देखिये बेइंसाफी वेतन फोर्थ क्लास से भी कम देते है,
रौब झड़ते बदले में चौबीस घंटें दबा कर काम लेते है।
ये जुल्म भी करते रौब से कहते विज्ञापन ले कर आओ,
उस में से अपना वेतन काट लो बाकी के जमा कराओ।
विडम्बना देखिये जो समाज का करता पोषण है ,
वो दुखी उसका बुरा हाल निरंतर हो रहा शोषण है।
इन बेचारो पे बॉस अक्सर अपना हुक्म चलाते है,
दिवाली के दिन किस्मत के मारो से डिब्बे मंगवाते है।
जो स्वाभिमानी दिवाली के दिन डिब्बा नही पंहुचाता है,
उपसम्पादक महोदय फिर उसकी खूब रेल बनाता है।
डिब्बा न मिलने का उपसम्पादक खूब बदला लेता है,
कोई बहाना बना कर पत्रकार को निकलवा भी देता है।
वैसे सरकार ने ऐसी कोई नौकरी अब तक बनाई नही है,
पर पत्रकार 17 साल नौकरी करने के बाद भी स्थाई नही है।
निसंदेह बॉस तो मौके बेमौके अपने देते खूब सफाई है,
मगर सच ये पत्रकार बकरा बॉस खूंखार निर्देयी कसाई है।
सोचो इस हालत में पत्रकार ईमानदारी कैसे निभायेगे,
यदि ईमानदारी निभायेंगे तो बच्चें भूखे मर जायेगे।
इसलिये मोदी जी आप से अनुरोध है कुछ हिम्मत दिखाये,
फटेहाल पत्रकारों पर कृपा कर उन्हें मेहनताना दिलवाये।
जब तक भरष्ट मिडिया से देश को छुटकारा नही मिलेगा,
तब तक भ्र्ष्टाचार विरोधी मुहीम को सहारा नही मिलेगा।
युवाओं आप की मर्जी हमारा फर्ज है आप को समझाना,
भूल कर भी मिडिया लाइन को अपना भविष्य न बनाना।
वर्ना रैना"की तरह जिन्दगी भर खुद को कोसोगे पछताओगे,
बाहर सूखे सलूटों की बौछार घर बीवी बच्चों की गालियां खाओंगे। रैना"
दोस्तों आप से अनुरोध है
ज्यादा से ज्यादा इस पोस्ट को शेयर करे। युवाओं के भविष्य का सवाल है
दोस्तों मुझे ये बताने में हो रहा भयंकर कष्ट है,
अधिकतर भारत का मिडिया हो गया भरष्ट है।
अधिकतर अख़बार पत्रकार नही गुर्गे ढूंढते है,
फिर गुर्गे सारा दिन पैसे बोतल और मुर्गे ढूंढते है।
कुछ गुर्गे खुद को बड़ा खतरनाक पत्रकार बताते है,
ऐसे बेचारे बॉस की सीटें ही बुक करते नजर आते है।
देखिये बेइंसाफी वेतन फोर्थ क्लास से भी कम देते है,
रौब झड़ते बदले में चौबीस घंटें दबा कर काम लेते है।
ये जुल्म भी करते रौब से कहते विज्ञापन ले कर आओ,
उस में से अपना वेतन काट लो बाकी के जमा कराओ।
विडम्बना देखिये जो समाज का करता पोषण है ,
वो दुखी उसका बुरा हाल निरंतर हो रहा शोषण है।
इन बेचारो पे बॉस अक्सर अपना हुक्म चलाते है,
दिवाली के दिन किस्मत के मारो से डिब्बे मंगवाते है।
जो स्वाभिमानी दिवाली के दिन डिब्बा नही पंहुचाता है,
उपसम्पादक महोदय फिर उसकी खूब रेल बनाता है।
डिब्बा न मिलने का उपसम्पादक खूब बदला लेता है,
कोई बहाना बना कर पत्रकार को निकलवा भी देता है।
वैसे सरकार ने ऐसी कोई नौकरी अब तक बनाई नही है,
पर पत्रकार 17 साल नौकरी करने के बाद भी स्थाई नही है।
निसंदेह बॉस तो मौके बेमौके अपने देते खूब सफाई है,
मगर सच ये पत्रकार बकरा बॉस खूंखार निर्देयी कसाई है।
सोचो इस हालत में पत्रकार ईमानदारी कैसे निभायेगे,
यदि ईमानदारी निभायेंगे तो बच्चें भूखे मर जायेगे।
इसलिये मोदी जी आप से अनुरोध है कुछ हिम्मत दिखाये,
फटेहाल पत्रकारों पर कृपा कर उन्हें मेहनताना दिलवाये।
जब तक भरष्ट मिडिया से देश को छुटकारा नही मिलेगा,
तब तक भ्र्ष्टाचार विरोधी मुहीम को सहारा नही मिलेगा।
युवाओं आप की मर्जी हमारा फर्ज है आप को समझाना,
भूल कर भी मिडिया लाइन को अपना भविष्य न बनाना।
वर्ना रैना"की तरह जिन्दगी भर खुद को कोसोगे पछताओगे,
बाहर सूखे सलूटों की बौछार घर बीवी बच्चों की गालियां खाओंगे। रैना"
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